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गणेश चतुर्थी | भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी

गणेश चतुर्थी पूजा विधि

श्री गणेश मंत्र, गायत्री मंत्र, पूजन विधि, व्रत कथा, आरती और विसर्जन विधि

गणेश चतुर्थी पूजा विधि का महत्व

गणेश चतुर्थी भगवान गणेश के जन्मोत्सव के रूप में मनाई जाती है। यह पर्व भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को आता है। भगवान गणेश विघ्नहर्ता, बुद्धि के दाता और सभी शुभ कार्यों के आरंभकर्ता माने जाते हैं। इस दिन विधि-विधान से पूजा करने से सभी कष्ट दूर होते हैं और मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।

गणेश चतुर्थी पर घर में गणेश जी की मूर्ति स्थापित कर 1, 3, 5, 7, 10 या 21 दिनों तक पूजा की जाती है। अनंत चतुर्दशी के दिन विसर्जन किया जाता है।

गणेश पूजन विधि (Ganesh Puja Vidhi)

1

प्रातः स्नान एवं शुद्धिकरण: प्रातः उठकर स्नान करें और पूजा स्थल को गंगाजल से शुद्ध करें। स्वच्छ वस्त्र धारण करें (लाल या पीत वर्ण के वस्त्र शुभ होते हैं)।

2

गणेश प्रतिमा स्थापना: एक चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर गणेश जी की प्रतिमा स्थापित करें। प्रतिमा पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके रखें।

3

प्राण प्रतिष्ठा: प्राण प्रतिष्ठा मंत्रों से मूर्ति में प्राण स्थापित करें (मंत्र नीचे दिए गए हैं)।

4

षोडशोपचार पूजन: आसन, स्वागत, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान, वस्त्र, यज्ञोपवीत, गंध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, ताम्बूल, फल, दक्षिणा और आरती से पूजन करें।

5

मंत्र जाप: गणेश मंत्रों का 108 बार जाप करें। विशेष रूप से "ॐ गं गणपतये नमः" मंत्र का जाप करें।

6

भोग एवं नैवेद्य: मोदक, लड्डू, दुर्वा, सिंदूर, पुष्प आदि अर्पित करें। गणेश जी को 21 मोदक और 21 दुर्वा अवश्य अर्पित करें।

7

आरती एवं प्रार्थना: "सुख करता दुख हर्ता" आरती करें और क्षमा प्रार्थना करें।

विशेष सावधानी:

गणेश जी को तुलसी अर्पित नहीं करनी चाहिए। केवल दुर्वा (तीन पत्ती वाली) ही चढ़ाएं।

गणेश चतुर्थी पर करें श्री गणेशजी के इन विशेष मंत्रों का जाप

॥ मूल मंत्र ॥

ॐ गं गणपतये नमः

Om Gam Ganapataye Namaha - 108 बार जाप करें

॥ एकाक्षर मंत्र ॥

ॐ गं

Om Gam - सभी विघ्नों का नाश करने वाला

॥ वक्रतुण्ड मंत्र ॥

वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ॥

॥ सुमुख मंत्र ॥

सुमुखश्चैकदन्तश्च कपिलो गजकर्णकः ।
लम्बोदरश्च विकटो विघ्नराजो गणाधिपः ॥

गणेश गायत्री मंत्र (Ganesh Gayatri Mantra)

ॐ एकदन्ताय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि ।
तन्नो दन्ती प्रचोदयात् ॥

Om Ekadantaya Vidmahe Vakratundaya Dhimahi | Tanno Danti Prachodayat ||

यह मंत्र बुद्धि, विवेक और ज्ञान की प्राप्ति के लिए अत्यंत प्रभावशाली है। प्रतिदिन 21 बार इसका जाप करने से मानसिक शांति और स्मरण शक्ति बढ़ती है।

द्वितीय गणेश गायत्री मंत्र:

ॐ लम्बोदराय विद्महे महोदराय धीमहि ।
तन्नो दन्ती प्रचोदयात् ॥

भगवान गणेश को सिंदूर जरूर लगाएं

गणेश जी को सिंदूर अत्यंत प्रिय है। पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान गणेश ने सिंदूर का प्रयोग कर अपने शरीर की रक्षा की थी। सिंदूर चढ़ाने से मंगल दोष दूर होता है, आयु में वृद्धि होती है और सौभाग्य की प्राप्ति होती है।

सिंदूर अर्पण मंत्र:

सिन्दूरं शोभनं रक्तं सौभाग्यं सुखवर्धनम् ।
शुभदं कामदं चैव सिन्दूरं प्रतिगृह्यताम् ॥

इस मंत्र से गणेश जी को सिंदूर अर्पित करें।

गणेश प्रतिमा स्थापना एवं प्राण प्रतिष्ठा मंत्र

इस दिन प्रात:काल स्नान आदि से निवृत्त होकर यथाशक्ति चांदी, तांबे, मिट्टी या फिर गोबर से भगवान गणेश की प्रतिमा बनानी चाहिए। इसके बाद नया कलश लेकर इसके मुख पर सफेद या लाल वस्त्र बांधकर उसके ऊपर गणेश जी की प्रतिमा स्थापित करनी चाहिए और मंत्रोच्चारण के साथ विधिवत रूप से इनका पूजन और अर्चन करना चाहिए। अंत में लड्डुओं का भोग लगाकर इनकी आरती करके प्रसाद वितरित करना चाहिए। शाम के समय फिर से उनका पूजन करके व 21 लड्डुओं का भोग लगाते हुए यथायोग्य दान आदि कर दक्षिणा के साथ प्रतिमा और कलश आचार्य को समर्पित कर देना चाहिए। पूजा के बाद मुख नीचे करके चंद्रमा को अर्घ्य भी देना चाहिए। अर्घ्य देते समय चंद्रमा को नहीं देखना चाहिए, ऐसा कहा गया है। क्योंकि इस दिन चंद्र दर्शन से कलंकित होना अथवा मिथ्या आरोप लगने का भय होता है।इस दिन लोगों को जल्दी उठकर स्नान करना चाहिए, फिर घर में मंदिर की सफाई करनी चाहिए. फिर 'दूर्वा घास', 'लड्डू' और 'मोदक' भगवान गणेश को अर्पित किए जाते हैं. भगवान की पूजा 'आरती' के साथ पूरी होती है.

ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्था गतोsपि वा
या स्मरेत पुण्डरीकाक्षं स बाह्रामायंतर: शुचि:।।

आवाहन मंत्र:

ॐ गणाधिपतये नमः आवाहयामि।

प्राण प्रतिष्ठा मंत्र:

ॐ अस्मै प्राणाः प्रतिष्ठन्तु अस्मै प्राणाः क्षरन्तु च।
अस्मै देहाय स्थिरत्वं भवतु स्वाहा॥

नेत्र उन्मीलन मंत्र:

ॐ ह्रीं नेत्राणि उन्मीलय उन्मीलय ह्रीं स्वाहा।

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विस्तृत पूजन विधि: अब हाथ में चावल लेकर गणेश-अम्बिका का ध्यान करें और निम्न मंत्रों से पूजन करें:

ॐ भूर्भुव:स्व: सिध्दिबुध्दिसहिताय गणपतये नम:,
गणपतिमावाहयामि, स्थापयामि, पूजयामि च!

ॐ भूर्भुव:स्व:गौर्ये नम:, गौरीमावाहयामि, स्थापयामि, पूजयामि च!

आसन समर्पण: आसन के लिए चावल चढ़ाएं।

ॐ गणेश-अम्बिके नम: आसनार्थे अक्षतान समर्पयामि!

स्नान विधि: फिर स्नान के लिए जल चढ़ाएं।

ॐ गणेशाम्बिकाभ्यां नम: स्नानार्थ जलं समर्पयामि!

फिर दूध चढ़ाएं।

ॐ भूर्भुव:स्व:गणेशाम्बिकाभ्यां नम:, पय:स्नानं समर्पयामि!

फिर दही चढ़ाएं।

ॐ भूर्भुव:स्व:गणेशाम्बिकाभ्यां नम:, दधिस्नानं समर्पयामि!

फिर घी चढ़ाएं।

ॐ भूर्भुव:स्व:गणेशाम्बिकाभ्यां नम:, घृतस्नानं समर्पयामि!

फिर शहद चढ़ाएं।

ॐ भूर्भुव:स्व:गणेशाम्बिकाभ्यां नम:, मधुस्नानं समर्पयामि।

फिर शक्कर चढ़ाएं।

ॐ भूर्भुव:स्व:गणेशाम्बिकाभ्यां नम:, शर्करास्नानं समर्पयामि।

फिर पंचामृत चढ़ाएं। (दूध, दही, शहद, शक्कर एवं घी को मिलाकर)

ॐ भूर्भुव:स्व:गणेशाम्बिकाभ्यां नम:, पंचामृतस्नानं समर्पयामि!

फिर चंदन घोलकर चढ़ाएं।

ॐ भूर्भुव:स्व:गणेशाम्बिकाभ्यां नम:, गंधोदकस्नानं समर्पयामि!

फिर शुद्ध जल डालकर शुद्ध करें।

ॐ भूर्भुव:स्व:गणेशाम्बिकाभ्यां नम:, शुध्दोदकस्नानं समर्पयामि!

वस्त्र एवं आभूषण: फिर उनको आसन पर विराजमान करें। फिर वस्त्र चढ़ाएं।

ॐ भूर्भुव:स्व:गणेशाम्बिकाभ्यां नम:, वस्त्रं समर्पयामि!

फिर आचमनी जल छोड़ दें। उसके बाद उपवस्त्र (मौली) चढ़ाएं।

ॐ भूर्भुव:स्व:गणेशाम्बिकाभ्यां नम:, उपवस्त्रं समर्पयामि!

फिर आचमनी जल छोड़ दे। फिर गणेश जी को यज्ञोपवित (जनेऊ) चढ़ाएं।

ॐ भूर्भुव:स्व:गणेशाभ्यां नम: यज्ञोपवितं समर्पयामि!

फिर आचमनी जल छोड़ दें।

सुगंध एवं पुष्प: फिर चन्दन लगाएं।

ॐ भूर्भुव:स्व:गणेशाम्बिकाभ्यां नम:, चंदनानुलेपनं समर्पयामि!

फिर चावल चढ़ाएं।

ॐ भूर्भुव:स्व:गणेशाम्बिकाभ्यां नम:, अक्षतान समर्पयामि!

फिर फूल-फूलमाला चढ़ाएं।

ॐ भूर्भुव:स्व:गणेशाम्बिकाभ्यां नम:, पुष्पमालां समर्पयामि!

फिर दूर्वा चढ़ाएं।

ॐ भूर्भुव:स्व:गणेशाम्बिकाभ्यां नम:, दुर्वाकरान समर्पयामि।

फिर सिन्दूर चढ़ाएं।

ॐ भूर्भुव:स्व:गणेशाम्बिकाभ्यां नम:, सिन्दूरं समर्पयामि!

फिर अबीर, गुलाल, हल्दी आदि चढ़ाएं।

ॐ भूर्भुव:स्व:गणेशाम्बिकाभ्यां नम:, नानापरिमलद्रव्याणि समर्पयामि!

फिर सुगंधित (इत्र) चढ़ाएं।

ॐ भूर्भुव:स्व:गणेशाम्बिकाभ्यां नम:, सुंगधिद्रव्यं समर्पयामि!

धूप-दीप: फिर धूप-दीप दिखाएं।

ॐ भूर्भुव:स्व:गणेशाम्बिकाभ्यां नम:, धूप-दीपं दर्शयामि!

नैवेद्य एवं फल: फिर ऋषि केशाय नम: बोलकर हाथ धोकर नैवेद्य लगाए।

ॐ प्राणाय स्वाहा! ॐ अपानाय स्वाहा! ॐ समानाय स्वाहा!

ॐ भूर्भुव:स्व:गणेशाम्बिकाभ्यां नम:, नैवेद्यं निवेदयामि!

फिर ऋतुफल चढ़ाएं।

ॐ भूर्भुव:स्व:गणेशाम्बिकाभ्यां नम:, ऋतुफलानि समर्पयामि!

फिर लौंग-इलायची, सुपारी अर्पित करें।

समापन: फिर दक्षिणा चढ़ाकर भगवान गणेश जी की आरती करें।

फिर परिक्रमा करें! तत्पश्चात भगवान गणेश-अम्बिका से प्रार्थना करें!

फिर दाहिने हाथ में जल लेकर पृथ्वी पर छोड़ दें।

प्रतिमा स्थापना के समय इन मंत्रों का उच्चारण करते हुए मूर्ति में प्राण प्रतिष्ठा करें।

गणपति स्थापना पूजा विधि Steps

  • 🍂चौकी पर लाल या पीला कपड़ा विछाकर भगवान गणेश की मूर्ती को विराजमान करें.
  • 🍂गणेश जी के चरणों को धोएं और उन्हें जल प्रदान करें.
  • 🍂अब आचमन करें और स्नान कराएं.
  • 🍂दूध, दही, घी, शहद, शक्कर, सुगंधित तेल और फिर जल से स्नान कराएं.
  • 🍂स्नान के बाद गणेशजी को वस्त्र भेंट करें.
  • 🍂गणेशजी को वस्त्र के रुप में धोती, पट्टका और जनेऊ दें.
  • 🍂गंध का अर्पण करें.
  • 🍂इत्र भेंट कर अक्षत अर्पण करें.
  • 🍂अक्षत अर्पण के बाद पुष्पार्पण करें.
  • 🍂गणेश जी को फूलों की माला पहनाए.
  • 🍂गणेशजी को दूर्वा भेंट करें और सिंदूर का तिलक करें.
  • 🍂एक थाली में पांच दीपक रखकर गणेशजी की आरती उतारें.
  • 🍂आरती उतारने के बाद गणेशजी को नैवेद्य दें.
  • 🍂पान, नारियल, सुपारी गणेशजी को भेंट करें.
  • 🍂गणेशजी का प्रदक्षिणा करें.
  • 🍂प्रदक्षिणा करने के बाद ऊं गं गणपताय नम: का जप करें.

गणेश चतुर्थी व्रत कथा (Ganesh Chaturthi Vrat Katha)

एक बार भगवान शिव और माता पार्वती नर्मदा नदी के तट पर विराजमान थे। माता पार्वती ने समय बिताने के लिए चौपड़ खेलने की इच्छा प्रकट की। भगवान शंकर तैयार हो गए, परंतु हार-जीत का फैसला कौन करे? तब भगवान शिव ने कुछ तिनकों से एक पुतला बनाकर उसमें प्राण डाल दिए और उसे फैसला करने को कहा।

तीन बार खेल हुआ और तीनों बार पार्वती जी विजयी हुईं। परंतु उस बालक ने भूलवश भगवान शिव को विजयी बता दिया। क्रोधित होकर माता पार्वती ने उसे लंगड़ा होने और कीचड़ में पड़े रहने का श्राप दे दिया। बालक ने क्षमा मांगी तो माता ने कहा कि गणेश चतुर्थी का व्रत करो, तुम्हें मुक्ति मिलेगी।

बालक ने 21 दिनों तक विधिपूर्वक गणेश व्रत किया। गणेश जी प्रसन्न हुए और उसे वरदान दिया। तभी से गणेश चतुर्थी का व्रत सभी मनोकामनाएं पूर्ण करने वाला माना जाता है।

इस व्रत को करने से सभी प्रकार के कष्ट दूर होते हैं, बुद्धि का विकास होता है और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।

सुख करता दुख हर्ता - गणेश जी की आरती

जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥


एक दंत दयावंत चार भुजा धारी।
माथे सिंदूर सोहे मूसे की सवारी॥
जय गणेश…

अंधन को आंख देत, कोढ़िन को काया।
बांझन को पुत्र देत, निर्धन को माया॥
जय गणेश…

हार चढ़े, फूल चढ़े और चढ़े मेवा।
लड्डुअन का भोग लगे संत करें सेवा॥
जय गणेश…

दीनन की लाज रखो, शंभु सुतकारी।
कामना को पूर्ण करो जाऊं बलिहारी॥
जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥

आरती एवं स्तुति: विसर्जन से पूर्व गणेश जी की निम्नलिखित आरती एवं स्तुति का गायन करें:

सुख करता दुख हर्ता

सुख करता दुख हर्ता, वार्ता विघ्नाची |
नूर्वी पूर्वी प्रेम कृपा जयाची ||
सर्वांगी सुन्दर उटी शेंदु राची |
कंठी झलके माल मुकताफळांची ||

जय देव जय देव जय मंगल मूर्ति
दर्शनमात्रे मनःकमाना पूर्ति .. जय देव जय देव

रत्नखचित फरा तुझ गौरीकुमरा |
चंदनाची उटी कुमकुम केशरा ||
हीरे जडित मुकुट शोभतो बरा |
रुन्झुनती नूपुरे चरनी घागरिया ||

जय देव जय देव जय मंगल मूर्ति
दर्शनमात्रे मनःकमाना पूर्ति .. जय देव जय देव

लम्बोदर पीताम्बर फनिवर वंदना |
सरल सोंड वक्रतुंडा त्रिनयना ||
दास रामाचा वाट पाहे सदना |
संकटी पावावे निर्वाणी रक्षावे सुरवर वंदना ||

जय देव जय देव जय मंगल मूर्ति
दर्शनमात्रे मनःकमाना पूर्ति .. जय देव जय देव

शेंदुर लाल चढायो अच्छा गजमुख को |
दोन्दिल लाल बिराजे सूत गौरिहर को ||
हाथ लिए गुड लड्डू साई सुरवर को |
महिमा कहे ना जाय लागत हूँ पद को ||

जय जय जी गणराज विद्यासुखदाता
धन्य तुम्हारो दर्शन मेरा मत रमता .. जय देव जय देव

अष्ट सिधि दासी संकट को बैरी |
विघन विनाशन मंगल मूरत अधिकारी ||
कोटि सूरज प्रकाश ऐसे छबी तेरी |
गंडस्थल मद्मस्तक झूल शशि बहरी ||

जय जय जी गणराज विद्यासुखदाता
धन्य तुम्हारो दर्शन मेरा मत रमता .. जय देव जय देव

भावभगत से कोई शरणागत आवे |
संतति संपत्ति सबही भरपूर पावे ||
ऐसे तुम महाराज मोको अति भावे |
गोसावीनंदन निशिदिन गुण गावे ||

जय जय जी गणराज विद्यासुखदाता
धन्य तुम्हारो दर्शन मेरा मत रमता .. जय देव जय देव

गणपति विसर्जन विधि (Ganpati Visarjan Vidhi)

विसर्जन से पहले: गणेश जी की पुनः पूजा करें। उन्हें मोदक, दुर्वा, सिंदूर, पुष्प अर्पित करें।

प्रार्थना: गणेश जी से आगामी वर्ष पुनः जल्दी आने का निवेदन करें। "गणपति बाप्पा मोर्या, पुढच्या वर्षी लवकर या" का उच्चारण करें।

विसर्जन मंत्र: निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुए मूर्ति को जल में विसर्जित करें:

ॐ गं गणपतये नमः।
आगच्छ आगच्छ प्रभो गणेश,
पुनः वर्षे पुनः आगमनाय च।
गच्छ गच्छ गणपते स्वस्थानं प्रति गच्छ।
ॐ शांति शांति शांति।

पर्यावरण हित: प्राकृतिक रूप से विघटित होने वाली मिट्टी की मूर्ति का ही विसर्जन करें। यदि घर में विसर्जन कर रहे हैं तो कलश या टब में जल भरकर विसर्जन करें और उस जल का पौधों में उपयोग करें।

सामान्य प्रश्न (FAQs)

प्रश्न: गणेश चतुर्थी पर घर पर कैसे करें पूजा?

उत्तर: प्रातः स्नान करें, गणेश प्रतिमा स्थापित करें, प्राण प्रतिष्ठा करें, षोडशोपचार से पूजन करें, मंत्रों का जाप करें, भोग लगाएं और आरती करें। विसर्जन अंतिम दिन करें।

प्रश्न: गणेश जी को कौन सा भोग प्रिय है?

उत्तर: गणेश जी को मोदक, लड्डू, दुर्वा, सिंदूर और लाल पुष्प अत्यंत प्रिय हैं। 21 मोदक और 21 दुर्वा अवश्य अर्पित करें।

प्रश्न: गणेश चतुर्थी पर कितने दिन मूर्ति रख सकते हैं?

उत्तर: मूर्ति 1.5, 3, 5, 7, 10 या 21 दिनों तक रख सकते हैं। अनंत चतुर्दशी के दिन विसर्जन किया जाता है।

प्रश्न: गणेश जी को तुलसी क्यों नहीं चढ़ाते?

उत्तर: पौराणिक मान्यता के अनुसार, तुलसी देवी और गणेश जी के बीच एक श्राप के कारण तुलसी गणेश जी को अर्पित नहीं की जाती। इसलिए केवल दुर्वा ही चढ़ाएं।

प्रश्न: विसर्जन के बाद मूर्ति का क्या करें?

उत्तर: मिट्टी की मूर्ति का प्राकृतिक जल स्रोत में विसर्जन करें। यदि संभव न हो तो घर में टब में विसर्जन करें और उस जल का पौधों में उपयोग करें।