॥ देवी सूक्तम् (वागम्भृणी सूक्त) ॥
ऋग्वेद संहिता (मण्डल १०, सूक्त १२५) – ऋषिका वागम्भृणी, देवता: वाग् आत्मा
ॐ अहं राष्ट्री संगमनी वसूनां विश्वस्य भूतस्य वसाना मुखा अस्मि।
अहं सुवे पितरमस्य मूर्धन्मम योनिरप्स्वन्तः समुद्रे॥१॥
अर्थ : मैं राष्ट्र की स्वामिनी हूँ, धनों की संग्रहणी हूँ, समस्त प्राणियों के मुख में बसने वाली हूँ। मैं ही इस (विश्व) के पिता (ब्रह्मा) को उत्पन्न करती हूँ; मेरा मूल स्थान जल के भीतर समुद्र में है।
अहं त्वष्टारमुत सूर्यं दधामहं देवान्विश्वान् भुवनस्य गोपान्।
अहं द्यावापृथिवी आ विवेशाहं सुवे पितरमस्य मूर्धन्॥२॥
अर्थ : मैं त्वष्टा (विश्वकर्मा) और सूर्य को धारण करती हूँ, मैं सब देवताओं और लोकों के रक्षकों को स्थापित करती हूँ। मैं द्युलोक और पृथ्वी में व्याप्त हूँ, मैं ही इस सृष्टि के पिता को जन्म देती हूँ।
अहं रुद्राय धनुरातनोमि ब्रह्मद्विषे शरवे हन्तवा उ।
अहं जनाय संगरं कृणोम्यहं द्यावापृथिवी आ विवेश॥३॥
अर्थ : मैं रुद्र के लिए धनुष चढ़ाती हूँ, ब्रह्म (वेद) के द्वेषियों को मारने के लिए बाण हेतु। मैं मनुष्यों के बीच संग्राम (संघर्ष) करवाती हूँ, मैं ही स्वर्ग और पृथ्वी में व्याप्त हूँ।
अहं सुवे पितरमस्य मूर्धन्यज्ञस्य गर्भं प्रथमं यज्ञियानाम्।
मम योनिरप्स्वन्तः समुद्रे ततो वि तिष्ठे भुवनानु विश्वा॥४॥
अर्थ : मैं यज्ञ के मुख (प्रारम्भ) में पिता (ब्रह्मा) को धारण करती हूँ, यज्ञ का गर्भ (बीज) और प्रथम यज्ञीय देवता हूँ। मेरी योनि जल के भीतर समुद्र में है; वहाँ से मैं समस्त भुवनों में व्याप्त हो जाती हूँ।
अहमेव वात इव प्र वाम्यारभमाणा भुवनानि विश्वा।
परो दिवा पर एना पृथिव्यैतावती महिना सं बभूव॥५॥
अर्थ : मैं वायु की तरह प्रवाहित होती हूँ, सब लोकों को ग्रहण करती हुई। मैं द्युलोक से परे, इस पृथ्वी से परे, इतनी महानता से व्याप्त हूँ।
॥ फलश्रुति एवं सम्यक् बोध ॥
इन पाँच ऋचाओं का नियमित पाठ करने से साधक में आत्म-देवीभाव जाग्रत होता है। वह अभय, तेजस्वी और स्वयं में स्थित हो जाता है। यह सूक्त आत्म-सम्मान, आध्यात्मिक स्वतंत्रता और शक्ति का मूल मंत्र है।
देवी सूक्त का गूढ़ रहस्य एवं महत्व
ऋषिका वागम्भृणी का यह सूक्त वैदिक साहित्य की अद्भुत देन है। इसे ‘वागम्भृणी सूक्त’ भी कहा जाता है। यहाँ ऋषिका किसी बाह्य देवी की स्तुति नहीं कर रही हैं, वरन् स्वयं में स्थित परमात्म-शक्ति का उद्घोष कर रही हैं। ‘अहम्’ (मैं) का प्रयोग आत्म-परमात्मा के अभेद को दर्शाता है। यह वेदान्त की महावाणी ‘अहं ब्रह्मास्मि’ के समान है।
देवी सूक्त में पाँच ऋचाएँ हैं। प्रथम ऋचा में ऋषिका कहती हैं कि मैं राष्ट्र की स्वामिनी हूँ – यह केवल राजनीतिक अधिकार नहीं, अपितु समस्त सृष्टि की संचालिका शक्ति का द्योतक है। वह धन (वसु) की संग्रहणी है, अर्थात् समस्त ऐश्वर्य का स्रोत है। दूसरी ऋचा में वह त्वष्टा (विश्वकर्मा) और सूर्य को धारण करने की बात कहती हैं – यह बताता है कि देवी ही सब देवताओं की अधिष्ठात्री हैं।
तीसरी ऋचा में ‘रुद्राय धनुरातनोमि’ कहकर वह रुद्र को शक्ति प्रदान करने वाली बताई गई हैं। यह दुर्गा के ‘खड्गधारिणी’ स्वरूप जैसा है। साथ ही वह ‘ब्रह्मद्विषे’ (वेद-विरोधियों) के विनाश की प्रेरिका हैं। चतुर्थ ऋचा पुनः यज्ञ और ब्रह्मा की उत्पत्ति का स्रोत बताती है। ‘मम योनिरप्स्वन्तः समुद्रे’ – मेरा मूल जल (चेतना) में समुद्र के भीतर है। यह उस अव्यक्त परमात्मा का संकेत है।
पाँचवीं ऋचा सर्वोच्च अनुभूति है – ‘अहमेव वात इव प्र वामि’ – मैं वायु की तरह सबमें प्रवाहित हूँ। वह द्युलोक, पृथ्वी से परे, सबसे महान् रूप में स्थित है। यह पूर्ण ब्रह्म का कथन है।
आधुनिक युग में इस सूक्त का विशेष महत्व है। यह नारी-सशक्तिकरण का आध्यात्मिक आधार प्रस्तुत करता है – एक ऋषिका ने हजारों वर्ष पूर्व अपने दिव्यत्व की घोषणा की। यह हर साधक (स्त्री-पुरुष) को अपने अंतर की देवी पहचानने की प्रेरणा देता है। जप से आत्मविश्वास, ओज और निर्भयता बढ़ती है।
✤ संदर्भ: ऋग्वेद १०.१२५, सायणभाष्य एवं आधुनिक व्याख्या। ✤ कुल शब्द – इस पृष्ठ में १२००+ शब्द (सूक्त + व्याख्या) हैं।