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श्री अन्नपूर्णा चालीसा

Doha🪶🪶

 

विश्वेश्वर पदपदम की रज निज शीश लगाय । अन्नपूर्णे, तव सुयश बरनौं कवि मतिलाय ।


Mantra:What to do?🪶🪶

 

नित्य आनंद करिणी माता, वर अरु अभय भाव प्रख्याता । जय ! सौंदर्य सिंधु जग जननी, अखिल पाप हर भव-भय-हरनी । श्वेत बदन पर श्वेत बसन पुनि, संतन तुव पद सेवत ऋषिमुनि । काशी पुराधीश्वरी माता, माहेश्वरी सकल जग त्राता । वृषभारुढ़ नाम रुद्राणी, विश्व विहारिणि जय ! कल्याणी । पतिदेवता सुतीत शिरोमणि, पदवी प्राप्त कीन्ह गिरी नंदिनि । पति विछोह दुःख सहि नहिं पावा, योग अग्नि तब बदन जरावा । देह तजत शिव चरण सनेहू, राखेहु जात हिमगिरि गेहू । प्रकटी गिरिजा नाम धरायो, अति आनंद भवन मँह छायो । नारद ने तब तोहिं भरमायहु, ब्याह करन हित पाठ पढ़ायहु । ब्रहमा वरुण कुबेर गनाये, देवराज आदिक कहि गाये । सब देवन को सुजस बखानी, मति पलटन की मन मँह ठानी । अचल रहीं तुम प्रण पर धन्या, कीहनी सिद्ध हिमाचल कन्या । निज कौ तब नारद घबराये, तब प्रण पूरण मंत्र पढ़ाये । करन हेतु तप तोहिं उपदेशेउ, संत बचन तुम सत्य परेखेहु । गगनगिरा सुनि टरी न टारे, ब्रहां तब तुव पास पधारे । कहेउ पुत्रि वर माँगु अनूपा, देहुँ आज तुव मति अनुरुपा । तुम तप कीन्ह अलौकिक भारी, कष्ट उठायहु अति सुकुमारी । अब संदेह छाँड़ि कछु मोसों, है सौगंध नहीं छल तोसों । करत वेद विद ब्रहमा जानहु, वचन मोर यह सांचा मानहु । तजि संकोच कहहु निज इच्छा, देहौं मैं मनमानी भिक्षा । सुनि ब्रहमा की मधुरी बानी, मुख सों कछु मुसुकाय भवानी । बोली तुम का कहहु विधाता, तुम तो जगके स्रष्टाधाता । मम कामना गुप्त नहिं तोंसों, कहवावा चाहहु का मोंसों । दक्ष यज्ञ महँ मरती बारा, शंभुनाथ पुनि होहिं हमारा । सो अब मिलहिं मोहिं मनभाये, कहि तथास्तु विधि धाम सिधाये । तब गिरिजा शंकर तव भयऊ, फल कामना संशयो गयऊ । चन्द्रकोटि रवि कोटि प्रकाशा, तब आनन महँ करत निवासा । माला पुस्तक अंकुश सोहै, कर मँह अपर पाश मन मोहै । अन्न्पूर्णे ! सदापूर्णे, अज अनवघ अनंत पूर्णे । कृपा सागरी क्षेमंकरि माँ, भव विभूति आनंद भरी माँ । कमल विलोचन विलसित भाले, देवि कालिके चण्डि कराले । तुम कैलास मांहि है गिरिजा, विलसी आनंद साथ सिंधुजा । स्वर्ग महालक्ष्मी कहलायी, मर्त्य लोक लक्ष्मी पदपायी । विलसी सब मँह सर्व सरुपा, सेवत तोहिं अमर पुर भूपा । जो पढ़िहहिं यह तव चालीसा फल पाइंहहि शुभ साखी ईसा । प्रात समय जो जन मन लायो, पढ़िहहिं भक्ति सुरुचि अघिकायो । स्त्री कलत्र पति मित्र पुत्र युत, परमैश्रवर्य लाभ लहि अद्भुत । राज विमुख को राज दिवावै, जस तेरो जन सुजस बढ़ावै । पाठ महा मुद मंगल दाता, भक्त मनोवांछित निधि पाता ।


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जो यह चालीसा सुभग, पढ़ि नावैंगे माथ । तिनके कारज सिद्ध सब साखी काशी नाथ ॥ ॥ इति श्री माँ अन्नपूर्णा चालीसा ॥



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