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About नवरात्रि : देवी पूजन की सही और सरल विधि
शक्ति के लिए देवी आराधना की सुगमता का कारण मां की करुणा, दया, स्नेह का भाव किसी भी भक्त पर सहज ही हो जाता है। ये कभी भी अपने बच्चे (भक्त) को किसी भी तरह से अक्षम या दुखी नहीं देख सकती है। उनका आशीर्वाद भी इस तरह मिलता है, जिससे साधक को किसी अन्य की सहायता की आवश्यकता नहीं पड़ती है। वह स्वयं सर्वशक्तिमान हो जाता है।> > इनकी प्रसन्नता के लिए कभी भी उपासना की जा सकती है, क्योंकि शास्त्राज्ञा में चंडी हवन के लिए किसी भी मुहूर्त की अनिवार्यता नहीं है।
नवरात्रि में इस आराधना का विशेष महत्व है। इस समय के तप का फल कई गुना व शीघ्र मिलता है। इस फल के कारण ही इसे कामदूधा काल भी कहा जाता है। देवी या देवता की प्रसन्नता के लिए पंचांग साधन का प्रयोग करना चाहिए। पंचांग साधन में पटल, पद्धति, कवच, सहस्त्रनाम और स्रोत हैं। पटल का शरीर, पद्धति को शिर, कवच को नेत्र, सहस्त्रनाम को मुख तथा स्रोत को जिह्वा कहा जाता है।
इन सब की साधना से साधक देव तुल्य हो जाता है। सहस्त्रनाम में देवी के एक हजार नामों की सूची है। इसमें उनके गुण हैं व कार्य के अनुसार नाम दिए गए हैं। सहस्त्रनाम के पाठ करने का फल भी महत्वपूर्ण है। इन नामों से हवन करने का भी विधान है। इसके अंतर्गत नाम के पश्चात नमः लगाकर स्वाहा लगाया जाता है।
हवन की सामग्री के अनुसार उस फल की प्राप्ति होती है। सर्व कल्याण व कामना पूर्ति हेतु इन नामों से अर्चन करने का प्रयोग अत्यधिक प्रभावशाली है। जिसे सहस्त्रार्चन के नाम से जाना जाता है। सहस्त्रार्चन के लिए देवी की सहस्त्र नामावली जो कि बाजार में आसानी से मिल जाती है कि आवश्यकता पड़ती है।
Significance of this Puja
माता दुर्गा के 9 रूपों की साधना करने से भिन्न-भिन्न फल प्राप्त होते हैं। कई साधक अलग-अलग तिथियों को जिस देवी की तिथि हैं, उनकी साधना करते हैं।
नवरात्री में घट स्थापना का बहुत महत्त्व है। नवरात्री की शुरुआत घट स्थापना से की जाती है।कलश को सुख समृद्धि , ऐश्वर्य देने वाला तथा मंगलकारी माना जाता है। कलश के मुख में भगवान विष्णु गले में रूद्र , मूल में ब्रह्मा तथा मध्य में देवी शक्ति का निवास माना जाता है। नवरात्री के समय ब्रह्माण्ड में उपस्थित शक्तियों का घट में आह्वान करके उसे कार्यरत किया जाता है।
इससे घर की सभी विपदा दायक तरंगें नष्ट हो जाती है तथा घर में सुख शांति तथा समृद्धि बनी रहती है।
नवरात्रि में 9 दिनों की पूजा विधि और मंत्र:
शैलपुत्री मां दुर्गा का प्रथम स्वरुप हैं।
मान्यता है कि शक्ति की प्रथम उत्पत्ति शैलपुत्री के रूप में ही हुई थी। नवरात्रि के पहले दिन इनकी ही पूजा करनी चाहिए। मां के सामने धूप, दीप जलाएं और देसी घी का दीपक जलाकर मां की आरती उतारें। इसके बाद शैलपुत्री माता की कथा, दुर्गा स्तुति या दुर्गा चालीसा का पाठ करें। इस दिन मां को गाय के घी से बनी सफेद चीजों का भोग लगाएं। इसके बाद शाम के समय मां की आरती कर उनका ध्यान करें।
मंत्र- ऊं शैलपुत्र्यै नम:।
ब्रह्मचारिणी:
नवरात्रि के दूसरे दिन मां भगवती के द्वितीय रूप ब्रह्मचारिणी देवी की पूजा की जाती है। सुबह पूजा के समय अपने हाथों में एक फूल लेकर देवी का ध्यान करें।इसके बाद उन्हें पंचामृत से स्नान कराएं, फिर फूल, कुमकुम, सिंदूर अर्पित करें। बता दें की देवी को सफेद और सुगंधित फूल प्रिय हैं। इसके अलावा आप कमल का फूल भी चढ़ा सकते हैं।
मंत्र – ऊँ ब्रह्मचारिण्यै नम:
दूसरा मंत्र- या देवी सर्वभूतेषु मां ब्रह्मचारिणी संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
चंद्रघंटा
नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा के रूप की पूजा की जाती है। सबसे पहले देवी के गंगा जल से स्नान कराएं। इसके बाद धूप-दीप, रोली , फूल और फल अर्पित करें। इसके बाद मां का ध्यान करें और मन में ऊं चंद्रघण्टायै नम: का जप करते रहें।
मंत्र- पिण्डजप्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकेर्युता.
प्रसादं तनुते मह्यं चंद्रघण्टेति विश्रुता॥
कूष्मांडा
इन दिन रोज की तरह सबसे पहले कलश की पूजा कर माता कूष्मांडा को नमन करें। इसके बाद मां को जल और पुष्प अर्पित करें। बता दें कि इस दिन पूजा में बैठने के लिए हरे रंग के आसन का इस्तेमाल करें। इस दिन मां को कद्दू के हलवे का भोग लगाएं।
मंत्र- ऊं कूष्माण्डायै नम:
दूसरा मंत्र- या देवी सर्वभूतेषु माँ कूष्माण्डा रूपेण संस्थिता. नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:
स्कंदमाता
नवरात्रि के पांचवे दिन स्कंदमाता की पूजा की जाती है। इस दिन सबसे पहले स्कंदमाता की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। इसके बाद गंगाजल से शुद्धिकरण करें। चौकी पर मिट्टी, तांबे या फिर चांदी के घड़े में जल भरकर उस पर कलश रखें और देवी का ध्यान करें। स्कंदमाता की उपासना करने से मनुष्य की सभी इच्छाएं पूर्ण हो जाती है। माता स्कंदमाता को केला प्रिय है। इस दिन मां को केले का भोग जरुर लगाएं।
मंत्र- या देवी सर्वभूतेषु मां स्कन्दमाता रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
दूसरा मंत्र- ऊं स्कंदमात्र्यै नम: ।।
कात्यायनी
नवरात्र के छठे दिन देवी कात्यायनी की पूजा अर्चना करनी चाहिए। इस दिन पूजा करते समय लाल या पीले रंग के वस्त्र धारण करें। इसके बाद कात्यायनी देवी की प्रतिमा स्थापित करें और फिर गंगाजल से उसकी शुद्धी करें। इसके बाद मां के सामने घी का दीपक जलाएं और पुष्प भी चढ़ाएं। इसके असाला मां को पीले रंग के फूलों के साथ कच्ची हल्दी की गांठ भी चढ़ाएं।
मंत्र – या देवी सर्वभूतेषु माँ कात्यायनी रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
दूसरा मंत्र – ऊं स्कन्दमात्र्यै नम:
कालरात्रि:
सातवें दिन कालरात्रि की आराधना करना चाहिए। मां की प्रतिमा की स्थापना करने के बाद मां को कुमकुम, लाल पुष्प, रोली आदि चढ़ाएं। इसके बाद मां को नींबूओं की माला पहने और उनके सामने दीपक जलाकर उनका पूजन करें। मां के मंत्रों का जाप करें या सप्तशती का पाठ करें। मां कालरात्रि को लाल रंग के फूल अर्पित करें। माता कालरात्रि को गुड़ या उससे बनी चीजों का भोग लगाना चाहिए।
या देवी सर्वभूतेषु मां कालरात्रि रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
ॐ कालरात्र्यै नम:
महागौरी
नवरात्र के आठवें दिन महागौरी की पूजा करना चाहिए। इस दिन सबसे पहले लकड़ी की चौकी या मंदिर में महागौरी की प्रतिमा की स्थापना करें। इसके बाद चौकी पर सफेद कपड़ा बिछाकर उस पर महागौरी यंत्र की स्थापना करें। मां महागौरी की पूजा करते समय पीले ये सफेद रंग के वस्त्र धारण कर सकते हैं। महागौरी को हलवा और चने का भोग लगाना चाहिए।
मंत्र- श्वेते वृषे समरूढा श्वेताम्बराधरा शुचिः। महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा।।
दूसरा मंत्र – ऊं महागौयैं नम:
सिद्धिदात्री:
मां जगदंबा का ये रूप पूर्ण स्वरूप है। पहले दिन जो पूजा अर्चना शैलपुत्री के रूप में की गई थी वह सिद्धिदात्री के रुप पर आकर पूर्ण हो जाती है। इस दिन सबसे पहले कलश की पूजा और पूजा स्थल पर सभी देवी-देवताओं का ध्यान करना चाहिए। इसके बाद माता के मंत्रो का जाप कर उनकी पूजा करनी चाहिए। मां सिद्धिदात्री को मौसमी फल, पूड़ी, खीर, नारियल, चना, और हलवा का भोग लगाना चाहिए।
मंत्र- या देवी सर्वभूतेषु मां सिद्धिदात्री रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।
दूसरा मंत्र- ऊं सिद्धिदात्र्यै नम:।
Method / Vidhi
लाल रंग का आसन
लाल रंग मां दुर्गा का सबसे खास रंग माना जाता है. इसलिए पूजा शुरू करने से पहले आसन के तौर पर कोई भी वस्त्र बिछाने से अच्छा है कि लाल रंग के कपड़े का इस्तेमाल किया जाए. इसके अलावा मां को लाल चुनरी और कुमकुम का टीका लगाना शुभ है. इसके अलावा ये चीजें भी जरूरी हैं.
- मिट्टी का पात्र और जौ
- साफ की हुई मिट्टी
- जल से भरा हुआ सोना, चांदी, तांबा, पीतल या मिट्टी का कलश
- लाल सूत्र, मौली, इलाइची, लौंग, कपूर, रोली
- साबुत सुपारी, साबुत चावल और सिक्के
- अशोक या आम के पांच पत्ते
- मिट्टी का ढक्कन
- पानी वाला नारियल
- लाल कपड़ा या चुनरी, सिंदूर
- फूल और फूल माला, नवरात्र कलश
खाली ना चढ़ाएं लाल चुनरी
मां दुर्गा को खाली चुनरी कभी ना चढ़ाएं. चुनरी के साथ सिंदूर, नारियल, पंचमेवा, मिष्ठान, फल, सुहाग का सामान चढ़ाने से मां खुश होती हैं और आर्शीवाद देती है. मां दुर्गा की चूड़ी, बिछिया, सिंदूर, महावर, बिंदी, काजल चढ़ाना चाहिए.
अखंड ज्योति के लिए
अगर आप नवरात्रि में अखंड ज्योति जलाना चाहते हैं तो पीतल या मिट्टी का दीया साफ कर ले. जोत के लिए रूई की बत्ती, रोली या सिंदूर, चावल जरूर रखें.
हवन के लिए
हवन कुंड, लौंग का जोड़ा, कपूर, सुपारी, गुग्ल, लोबान, घी, पांच मेवा, चावल
Mantras & Slokas
मां दुर्गा को सबसे प्रिय हैं ये 4 सरल मंत्र, चारों दिशाओं से मिलेगी सफलता
1.
* सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके।
शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणि नमोऽस्तुते।।
2.
* ॐ जयन्ती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी।
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तुते।।
3.
* या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता,
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।
* या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मीरूपेण संस्थिता,
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।
* या देवी सर्वभूतेषु तुष्टिरूपेण संस्थिता,
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।
* या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता,
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।
* या देवी सर्वभूतेषु दयारूपेण संस्थिता,
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।
* या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता,
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।
* या देवी सर्वभूतेषु शांतिरूपेण संस्थिता,
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।
4.
* नवार्ण मंत्र 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै' का जाप अधिक से अधिक अवश्य करें।
Puja Fees
Rs.2100 - 4100
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